Saturday, 21 July 2012

न तेरा न मेरा


लेखिका-
शिवानी (कक्षा 3 की छात्रा  )
 
लोधियागैर नाम के गांव में  आम  का एक बगीचा था। उस बगीचे में बहुत सारे आम लगे थे। एक दिन गांव में ही रहने वाले दो बच्चे राजू ने आम खाने की सोची। वह आम तोड़ने के लिए बगीचे में गए । आम को पेड़ के बहुत ऊपर देखकर उसने आम तोड़ने के लिए पत्थर उठाया और आम तोड़ने लगा।  एक पत्थर सीधे आम में जा लगा और आम टूट कर जमीन में गिर गया। आम को जमीन में गिरा देख जैसे ही राजू उसे उठाने के लिए आगे बढ़ा तभी अचानक एक कौआ वहाँ आया। कौव्वे ने अपनी चोंच में आम को दबा लिया और उसे लेकर  वह वहाँ से उड़ गया। यह देख राजू  कौव्वे के पीछे भागा। कौआ आगे-आगे उड़  रहा था और राजू उसका पीछा कर रहा था। अचानक कौव्वे की चोंच से आम छूटकर   मधुमक्खी के छत्ते में जा गिरा। छत्ते में आम गिरने से सारी मधुमक्खियां यहाँ-वहाँ उड़ने लगी। यह देख राजू  डर के मारे भाग गया। वह आम न कौव्वे को मिला और न ही राजू  को।


Tuesday, 17 July 2012

स्कूल में मेरा मन नहीं लगता


रवि कुमार
(कक्षा पांच का छात्र  )

कभी मुझे ऐसा लगता है मानो मेरे घर में मेरा पूरा संसार है। लेकिन जो मम्मी कहती है वैसा मुझे लगता नहीं और जो अध्यापक कहते हैं वैसा मुझे करने का मन नहीं करता। कभी-कभी तो ऐसा लगता है मेरा स्कूल कोई घर नहीं बल्कि एक जेल है। जैसे जेलों में बुरे लोगों को बंद कर दिया जाता है वैसे ही हमें अपनी कक्षा में बंद कर के पढ़ाया जाता है। मैं सोचता हूँ कि जेल में उन लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है जो बुरे काम करते हैं, लेकिन हमने तो कुछ भी बुरा नहीं किया। फिर हमें क्यों स्कूल में बंद कर दिया जाता है। अगर हम बुरा नहीं करते हैं तो हमें स्कूल में क्यों मार पड़ती है। 
मैं तो बाहर जाकर खेलना चाहता हूँ और उसको ढूँढना चाहता हूँ जिसने हमारे लिए स्कूल बनाया। और उनसे यह पूछना चाहता हूँ कि जो हम कर सकते हैं उसे हमें क्यों नहीं करने दिया जाता है ? स्कूल में हमेषा अध्यापक मुझे पढ़ने को कहते हैं। नहीं पढ़ने पर वह मुझे मारते हैं और कहते हैं कि नहीं पढ़ने वालों को जेल में डाल दिया जाता है। 
मैं हमेषा यह सोचता हूँ कि मेरे साथ पढ़ने के लिए जबरदस्ती क्यों किया जाता है? जो अध्यापक मुझे पढ़ाते हैं वह मेरे समझ में क्यों नहीं आता है ? मैं क्या करूं.................?





इच्छा


  
मेरी उम्र आज लगभग 300 वर्ष हो चुकी है। इस दौरान मैंने कई इतिहास; बनते बिगड़ते देखें है। धूल-धक्कड़ भरे इस वातावरण में, मैंने  सुहावने और स्वतंत्र जीवन बिताएं हैं । बूढ़ी शाखों पर जब कभी हरी-हरी कोंपले खिलती हैं, तो  बरबस ही बचपन की यादों में खो जाता हूँ । 
बीज अंकुरित के समय; धरती की अंधकारमय वातावरण से जब भी मैं बाहारी दुनिया के बारे में सोचता, तो मेरा रोम-रोम रोमाच से भर जाता । मेरी सोच उस वातावरण से मिलने को इतनी  उतावली हो चुकी थी, कि मैं और अधिक समय तक नहीं ठहर सकता था । 
एक दिन, धड़ाम से ! ‘‘ मैं बीज में से फूट पड़ा ’’ और ‘‘मैंने खुले आसमान के नीचे पहली साँस ली ।’’ सुबह की पहली रोशनी, मेरे कोमल-कोमल कोंपलों को छूकर परिवर्तित होती तो, मैं शरमा कर पानी-पानी हो जाता । पहली बार सूर्य की किरणों से भोजन बनने की प्रक्रिया से अवगत हुआ । पत्तों और किरणों के अकर्षण मेल से बनी, वह पहली भोजन का स्वाद, आज भी मेरे जिभ पर है । 
अपने आरम्भिक काल में, मै अकशर, सुबह की पहली किरणों का इंतजा़र करता । जिस किसी दिन बादलों के कारण किरणें नहीं दिखाई देती तो मैं व्याकुल हो जाता । मेरी आँखें सारा दिन किरणों को ढूंढती। फिर कुछ भी करने का मन नहीं करता । हाँ ! मेरे आस-पास के पौंधे, बादलों के छा जाने पर हिल्लौरे भरा करते थे । वे... बड़ा खुश हुआ करते थे । मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि वे ऐसा क्यों करते थे । मैं तो सारा दिन किरणों का इंतजार करता और आकाश की ओर देखता रहता । 
‘‘हंसी आती है मुझे इन आँखों पर आज चस्मा भी नहीं लगा सकता ’’  
धूल-धक्कड़......! ‘‘छोड़ो ये बातें ।’’
हाँ तो मैं अपनी बात को आगे बढ़ाता हूँ...........।

जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ तो न जाने मेरी शाखों पर किसी के बैठने और चलने की आहट से मैं घबरा गया । मैंने जब इधर-उधर देखा तो  एक नन्ही सी चिडि़या मेरे टहनी पर बैठी थी । वह कुछ गुनगुना रही थी । ध्यान लगाकर सुना तो, नन्ही चिडि़या मीठी आवाज़ में गा रही थी । मैंने तुरंत अपनी डालियों को झूले की तरह हिलया और उसके गाने की तारिफ की । तारिफ सुनते ही, नन्ही चिडि़या मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि, ‘‘ क्या मैं आपकी डाली में अपना घोंषला बना सकती हूँ ।’’
 मेरे मुँह से तुरंत ही निकल पड़ा, ‘‘क्यों नहीं ’’ और उसने मेरी डाली पर अपना घोंषला बना लिया । 
धीरे-धीरे मेरी शाखें बड़ने लगीं । एक साल, दो साल, तीन साल, और फिर देखते-ही-देखते मैं पौंधे से एक विशाल वृक्ष बन गया । अब मैं तेज धुप, आँधि-तुफान व मुस्लाधार बरसात से नहीं घबराता, और न ही इनके प्रकोप से डरता था । मेरे अन्दर आत्मविश्वास कुट-कुट के भर चुका था ।
 मुझे याद है वह पहली नन्ही चिडि़या, उसके परिवार के लोग मेरी ही शाखों में रहते हैं । अंडे-बच्चे, जवान-बूढ़े, सभी प्रकार के चिडि़याँ। उन्हें मैं आँधि-तुफानो व धूप से बचाता हूँ । 
अब आप कहेंगे ये तो बड़ा घमण्डी हो गया ? अपने आप मिया मिठ्ठू बन रहा है । मुझे लगता है ये सभी मेरे परिवार के ही हिस्से हैं.... और मैं घमण्ड क्यों न करू ? क्या अपने परिवार को बचाना और उसके बारे में कहना, घमण्ड करना है, तो होए । मेरा परिवार है और इनकी रक्षा करना मैंरा कर्तव्य है ।
आज मैं बूढ़ा हो चुका हूँ पर फिर भी मेरे अन्दर जीने की इच्छा है। मेरी ये ही इच्छा मुझे इस उम्र में भी हर मुश्किलो से लड़ने की ताकत देती है। मैं इससे ज्याद अब कुछ नहीं कहूँगा। बस इतना कहना चाहता हूँ कि इच्छा शक्ति ही हर मुश्किलो से लड़ने की दवा है...........। 
                                                   
मनोज प्रसाद

Monday, 16 July 2012

बच्चों में भाषा की समझ कैसी बढाएं ?



-मनोज प्रसाद 
अक्सर कहा जाता है कि बच्चे गतिविधियों से जल्दी सीखते हैं, लेकिन क्या कोई भी गतिविधि करने से वे सीख जाते हैं ? शायद    सीख भी जाते हैं और नहीं भी। लेकिन जब तक कोई भी गतिविधि सकारात्मक दिशा  में सोच को नहीं बढ़ाती, तब तक वह बोध का सृजन नहीं करती। अतः बोध का सृजन तभी होता है, जब सीखने वाला गतिविधि खुद करके उससे प्राप्त समझ को आपने अनुभव से जोड़ ले। इसलिए हमें न सिर्फ गतिविधियों को अच्छी तरह से समझने और करने की ज़रूरत है, बल्कि यह जानने की बहुत जरूरत है कि यह गतिविधि क्यों की जा रही है ? साथ ही हमें यह भी जानने की जरूरत है कि कैसे गतिविधियों को बोध विकसित करने से जोड़ा जाए। 
अतः संक्षेप में बोध के लिये हमें अपने लक्ष्य के बारे में बारिकी से सोचना चाहिए। जैसे जब भी हम भाषा   से सम्बन्धित बातें करते हैं तो यही कहते हैं कि भाषा  बातचीत का माध्यम है। लेकिन हम यह नहीं कहते कि  भाषा  हमें सोचने, महसूस करने और किसी चीज़ पर अपनी राय देने या व्यक्त करने का माध्यम है। विषेश तौर पर जब हम बच्चों के साथ काम करते हैं तो हमें भाशा के इस संदर्भ को समझने की आवश्यकता  है। भाषा  को अगर हम सोचने, महसूस करने और किसी चीज़ पर अपनी राय देने के संदर्भ में प्रयोग करेंगे तो बच्चों की न केवल भाशा क्षमता बढ़ेगी, बल्कि उनका सर्वांगिक विकास भी होगा। 
गणित के संदर्भ में बात करें तो यहाँ भी हमें यह जानना जरूरी है कि गणित करने का मतलब संख्या पहचान और कुछ क्रियाएं जान लेना ही नहीं है। गणित करने का मतलब है कि किसी भी बच्चे में तर्क संगत  सोच विकसित हो जाए। 
इसलिए, लक्ष्य को बारिकी से स्पष्ट  के साथ जानने एवं समझने की बहुत जरूरत है। तभी हम बच्चों के साथ किसी गतिविधि को करने के क़ाबिल हो पाएंगे और उन्हें स्वतंत्र बना पाएंगे।