Tuesday, 17 July 2012

इच्छा


  
मेरी उम्र आज लगभग 300 वर्ष हो चुकी है। इस दौरान मैंने कई इतिहास; बनते बिगड़ते देखें है। धूल-धक्कड़ भरे इस वातावरण में, मैंने  सुहावने और स्वतंत्र जीवन बिताएं हैं । बूढ़ी शाखों पर जब कभी हरी-हरी कोंपले खिलती हैं, तो  बरबस ही बचपन की यादों में खो जाता हूँ । 
बीज अंकुरित के समय; धरती की अंधकारमय वातावरण से जब भी मैं बाहारी दुनिया के बारे में सोचता, तो मेरा रोम-रोम रोमाच से भर जाता । मेरी सोच उस वातावरण से मिलने को इतनी  उतावली हो चुकी थी, कि मैं और अधिक समय तक नहीं ठहर सकता था । 
एक दिन, धड़ाम से ! ‘‘ मैं बीज में से फूट पड़ा ’’ और ‘‘मैंने खुले आसमान के नीचे पहली साँस ली ।’’ सुबह की पहली रोशनी, मेरे कोमल-कोमल कोंपलों को छूकर परिवर्तित होती तो, मैं शरमा कर पानी-पानी हो जाता । पहली बार सूर्य की किरणों से भोजन बनने की प्रक्रिया से अवगत हुआ । पत्तों और किरणों के अकर्षण मेल से बनी, वह पहली भोजन का स्वाद, आज भी मेरे जिभ पर है । 
अपने आरम्भिक काल में, मै अकशर, सुबह की पहली किरणों का इंतजा़र करता । जिस किसी दिन बादलों के कारण किरणें नहीं दिखाई देती तो मैं व्याकुल हो जाता । मेरी आँखें सारा दिन किरणों को ढूंढती। फिर कुछ भी करने का मन नहीं करता । हाँ ! मेरे आस-पास के पौंधे, बादलों के छा जाने पर हिल्लौरे भरा करते थे । वे... बड़ा खुश हुआ करते थे । मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि वे ऐसा क्यों करते थे । मैं तो सारा दिन किरणों का इंतजार करता और आकाश की ओर देखता रहता । 
‘‘हंसी आती है मुझे इन आँखों पर आज चस्मा भी नहीं लगा सकता ’’  
धूल-धक्कड़......! ‘‘छोड़ो ये बातें ।’’
हाँ तो मैं अपनी बात को आगे बढ़ाता हूँ...........।

जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ तो न जाने मेरी शाखों पर किसी के बैठने और चलने की आहट से मैं घबरा गया । मैंने जब इधर-उधर देखा तो  एक नन्ही सी चिडि़या मेरे टहनी पर बैठी थी । वह कुछ गुनगुना रही थी । ध्यान लगाकर सुना तो, नन्ही चिडि़या मीठी आवाज़ में गा रही थी । मैंने तुरंत अपनी डालियों को झूले की तरह हिलया और उसके गाने की तारिफ की । तारिफ सुनते ही, नन्ही चिडि़या मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि, ‘‘ क्या मैं आपकी डाली में अपना घोंषला बना सकती हूँ ।’’
 मेरे मुँह से तुरंत ही निकल पड़ा, ‘‘क्यों नहीं ’’ और उसने मेरी डाली पर अपना घोंषला बना लिया । 
धीरे-धीरे मेरी शाखें बड़ने लगीं । एक साल, दो साल, तीन साल, और फिर देखते-ही-देखते मैं पौंधे से एक विशाल वृक्ष बन गया । अब मैं तेज धुप, आँधि-तुफान व मुस्लाधार बरसात से नहीं घबराता, और न ही इनके प्रकोप से डरता था । मेरे अन्दर आत्मविश्वास कुट-कुट के भर चुका था ।
 मुझे याद है वह पहली नन्ही चिडि़या, उसके परिवार के लोग मेरी ही शाखों में रहते हैं । अंडे-बच्चे, जवान-बूढ़े, सभी प्रकार के चिडि़याँ। उन्हें मैं आँधि-तुफानो व धूप से बचाता हूँ । 
अब आप कहेंगे ये तो बड़ा घमण्डी हो गया ? अपने आप मिया मिठ्ठू बन रहा है । मुझे लगता है ये सभी मेरे परिवार के ही हिस्से हैं.... और मैं घमण्ड क्यों न करू ? क्या अपने परिवार को बचाना और उसके बारे में कहना, घमण्ड करना है, तो होए । मेरा परिवार है और इनकी रक्षा करना मैंरा कर्तव्य है ।
आज मैं बूढ़ा हो चुका हूँ पर फिर भी मेरे अन्दर जीने की इच्छा है। मेरी ये ही इच्छा मुझे इस उम्र में भी हर मुश्किलो से लड़ने की ताकत देती है। मैं इससे ज्याद अब कुछ नहीं कहूँगा। बस इतना कहना चाहता हूँ कि इच्छा शक्ति ही हर मुश्किलो से लड़ने की दवा है...........। 
                                                   
मनोज प्रसाद

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