Tuesday, 17 July 2012

स्कूल में मेरा मन नहीं लगता


रवि कुमार
(कक्षा पांच का छात्र  )

कभी मुझे ऐसा लगता है मानो मेरे घर में मेरा पूरा संसार है। लेकिन जो मम्मी कहती है वैसा मुझे लगता नहीं और जो अध्यापक कहते हैं वैसा मुझे करने का मन नहीं करता। कभी-कभी तो ऐसा लगता है मेरा स्कूल कोई घर नहीं बल्कि एक जेल है। जैसे जेलों में बुरे लोगों को बंद कर दिया जाता है वैसे ही हमें अपनी कक्षा में बंद कर के पढ़ाया जाता है। मैं सोचता हूँ कि जेल में उन लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है जो बुरे काम करते हैं, लेकिन हमने तो कुछ भी बुरा नहीं किया। फिर हमें क्यों स्कूल में बंद कर दिया जाता है। अगर हम बुरा नहीं करते हैं तो हमें स्कूल में क्यों मार पड़ती है। 
मैं तो बाहर जाकर खेलना चाहता हूँ और उसको ढूँढना चाहता हूँ जिसने हमारे लिए स्कूल बनाया। और उनसे यह पूछना चाहता हूँ कि जो हम कर सकते हैं उसे हमें क्यों नहीं करने दिया जाता है ? स्कूल में हमेषा अध्यापक मुझे पढ़ने को कहते हैं। नहीं पढ़ने पर वह मुझे मारते हैं और कहते हैं कि नहीं पढ़ने वालों को जेल में डाल दिया जाता है। 
मैं हमेषा यह सोचता हूँ कि मेरे साथ पढ़ने के लिए जबरदस्ती क्यों किया जाता है? जो अध्यापक मुझे पढ़ाते हैं वह मेरे समझ में क्यों नहीं आता है ? मैं क्या करूं.................?





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