-मनोज प्रसाद
अक्सर कहा जाता है कि बच्चे गतिविधियों से जल्दी सीखते हैं, लेकिन क्या कोई भी गतिविधि करने से वे सीख जाते हैं ? शायद सीख भी जाते हैं और नहीं भी। लेकिन जब तक कोई भी गतिविधि सकारात्मक दिशा में सोच को नहीं बढ़ाती, तब तक वह बोध का सृजन नहीं करती। अतः बोध का सृजन तभी होता है, जब सीखने वाला गतिविधि खुद करके उससे प्राप्त समझ को आपने अनुभव से जोड़ ले। इसलिए हमें न सिर्फ गतिविधियों को अच्छी तरह से समझने और करने की ज़रूरत है, बल्कि यह जानने की बहुत जरूरत है कि यह गतिविधि क्यों की जा रही है ? साथ ही हमें यह भी जानने की जरूरत है कि कैसे गतिविधियों को बोध विकसित करने से जोड़ा जाए।
अतः संक्षेप में बोध के लिये हमें अपने लक्ष्य के बारे में बारिकी से सोचना चाहिए। जैसे जब भी हम भाषा से सम्बन्धित बातें करते हैं तो यही कहते हैं कि भाषा बातचीत का माध्यम है। लेकिन हम यह नहीं कहते कि भाषा हमें सोचने, महसूस करने और किसी चीज़ पर अपनी राय देने या व्यक्त करने का माध्यम है। विषेश तौर पर जब हम बच्चों के साथ काम करते हैं तो हमें भाशा के इस संदर्भ को समझने की आवश्यकता है। भाषा को अगर हम सोचने, महसूस करने और किसी चीज़ पर अपनी राय देने के संदर्भ में प्रयोग करेंगे तो बच्चों की न केवल भाशा क्षमता बढ़ेगी, बल्कि उनका सर्वांगिक विकास भी होगा।
गणित के संदर्भ में बात करें तो यहाँ भी हमें यह जानना जरूरी है कि गणित करने का मतलब संख्या पहचान और कुछ क्रियाएं जान लेना ही नहीं है। गणित करने का मतलब है कि किसी भी बच्चे में तर्क संगत सोच विकसित हो जाए।
इसलिए, लक्ष्य को बारिकी से स्पष्ट के साथ जानने एवं समझने की बहुत जरूरत है। तभी हम बच्चों के साथ किसी गतिविधि को करने के क़ाबिल हो पाएंगे और उन्हें स्वतंत्र बना पाएंगे।
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